तुलसीदास की रामचरितमानस इतनी प्रसिद्ध क्यों हैं, शास्त्रानुसार जानिए इसकी लोकप्रियता का कारण

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22 जनवरी 2024 को अयोध्या में राममंदिर का उद्घाटन और रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद से ही संपूर्ण भारत राममय हो गया है. इसी परिप्रेक्ष्य में हम रामचरितमानस की लोकप्रियता को समझने का प्रयास करेगें.

कल्याण रामायण अंक के अनुसार, संसार के जितने काम हैं सब किसी-न-किसी प्रयोजन से किये जाते हैं. गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना का कारण यह लिखा है:–
स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-भाषानिबन्धमतिमन्जुलमातनोति।।

काव्य-रचना यश के लिए की जाती है, धन कमाने के लिए की जाती है, अमंगल नाश के लिए की जाती है और उपदेश के लिए की जाती है. लेकिन यहां तो प्रयोजन केवल अपने अन्तःकरण का सुख है, जिसे संस्कृत में पर-निर्वृत्ति कहते हैं, परन्तु गोस्वामीजी आगे चलकर एक बात और कहते हैं-
“बरनों रघुबर बिसद जस सुनि कलिकलुष नसाय।” 

अर्थ:– राम का यश सुनने से काल का अत्याचार रोका जा सकता है.

गोस्वामीजी का मुख्य प्रयोजन है- मोरे मन प्रबोध जेहि होई (अपनी बुद्धि के अनुसार), क्योंकि राम-कथा ‘निज सन्देह मोह-अम-इरणी’ (अपना सन्देह मिटाने)और भवसरिता तरणी’ (संसार सागर पार करना) है. आश्चर्य यह है कि गोस्वामी जी के स्वार्थ से संसार का परमार्थ कैसे सिद्ध हो गया? हमारी समझ में यह आता है, कि उन्होंने अपने समय के सारे प्रचलित धर्म ध्यान से देखे थे. उन्होंने अपने सन्तोष के लिए जो राह निकाली, वही संसार के लिये धर्म-मार्ग बन गईं. ‘नानापुराण निगमागम’ (शिव के मुख से निकलकर गिरिजा के कान तक पहुंचा और देवी के मुख से निकला ज्ञान या सभी शास्त्रोक्त ज्ञान का निचोड़) मथकर जो रस निकाला वह भारतवर्ष के लिए रसायन बन गया.

भिन्न–भिन्न रुचि वाले सब यह सुधारस पान करके छक गए. शैव और वैष्णव जो एक दूसरे से लड़ते थे, सबको यह रस अच्छा लगा. विचारने की बात है कि इसमें ऐसी कौन-सी बात थी. इस ग्रंथ में सभी संप्रदायों के इष्ट देवों का सम्मान किया है. हमारे सनातन धर्म में पंच (पांच) देव की उपासना विधि हैं (शिव, विष्णु, देवी, गणेश और सूर्य). इन सब के बारे में तुलसीदास ने अपनी ग्रंथ में गुणगान किया है.

किसी कवि की रचना को समझने के लिए कवि के समय की देश-दशा जानने की बड़ी आवश्यकता है. वह कितनी बातें समयानुकूल कह डालते हैं जो तत्कालीन इतिहास जाने बिना समझ में नहीं आ सकती. गोस्वामी जी ने एक तो “कराल कलिकाल सूल-मूल तामें कोढ़ की खाज-सी सनीचरी है मीनकी.”

इसको समझने के लिए इतिहास की शरण लेनी पड़ती है. इस पंक्ति की व्याख्या बड़ी रोचक है. इसके लिए हम भाषा के सुप्रसिद्ध विद्वान् और मानस के अनुरागी सर जार्ज ग्रियर्सन के नोट्स (Notes) से एक अंश का अनुवाद उद्धृत करते हैं. ‘तुलसीदासजी के जीवन काल में शनैश्चर (शनि देव का प्रभाव) ने मीन राशि में दो बार प्रवेश किया, पहले चैत सुदी 1 संवत 1640 में, जो ज्येष्ठ संवत 1642 तक रहा और दूसरी बार चैत सुदी 2 सं० 1666 में. इस बार ‘मीन की सनीचरी’ जेष्ठ सं० 1671 तक रही, और इसी सनीचरी में दूसरों समुदायों का अत्याचार बनारस में बहुत बढ़ गया था.

मुख्य रूप से ये 3 लोग तुलसीदास रामायण रचना के केंद्र बिंदु बने : –

(1) आदि शंकराचार्य का वेदांत- आदि शंकराचार्य का प्रादुर्भाव आजकल की गवेषणा (गणना) के अनुसार विक्रम संवत की नवीं शताब्दी में हुआ था. इन्होंने वेदान्त (बादरायण) सूत्र की एक टीका लिखी है जो ‘शंकर भाष्य’ के नाम से प्रसिद्ध है. इसके दूसरे अध्याय में इन्होंने अपने समय के प्रचलित धर्मों का खण्डन किया है. स्वामी शंकराचार्य ने बौद्धों को परास्त करके भारतवर्ष के बाहर निकाल दिया था. उनकी शिक्षा का प्रभाव आजकल भी हिन्दू-धर्म पर बहुत है. गोस्वामी जी के समय में इस मत के अनुयायी बहुत थे.

इसलिए पहला धर्म, जिसकी छटा देखने का प्रयत्न करना उचित समझा गया, शंकर का वेदान्त था और रामचरित-वर्णन में  वेदान्त लाने के लिए शंकर गिरीजा का संवाद उसमें मिला दिया गया, या यों कहना चाहिए कि रामचरित के बखान ने बताया कि श्रीराम के परमभक्त एक शंकर ही हैं. स्वामी शंकराचार्य भी शंकर के अवतार माने जाते हैं. इसी कारण शंकर के मुंह से शंकर का वेदान्त मानस में डाल दिया गया. मानस के पढ़ने वाले जो वेदांत से परिचित हैं, गिरिजा-शंकर के संवाद‌ में पद-पद पर वेदांत के सिद्धान्त देखेंगे. मानस में जो वेदांत का निचोड़ है वे शंकराचार्य भाष्य वेदांत की मात्रा अधिक है.

(2) रामानुज (लक्ष्मण) का श्रीवैष्णव-सम्प्रदाय : – दूसरा मत जो गोस्वामी जी के समय में खूब प्रचलित था, स्वामी रामानुज का था. स्वामी रामानुज के सम्प्रदाय को श्रीसम्प्रदाय कहते हैं. रामचरितमानस में इस सम्प्रदाय के समर्थक श्रीलक्ष्मणजी हैं. हम अपनी इस कल्पना की पुष्टि में मुंशी सुखदेवलाल जी (हिंदी भाषा में इनका भरपूर योगदान है) की टीका से एक अंश उद्भुत करते हैं-

“बन्दौं लछिमन पद-जल-जाता। सीतल सुखद मक्क-सुख-दाता ।। रघुपति कीरति बिमल पताका । दंड समान भयो जस जाका।।”
“ता पाछे श्री उर्मिला-पति लक्ष्मणजी के चरण कमल अति सीतल और सुन्दर भक्तजनों के आनन्ददाता तिनको मैं प्रणाम करता हूँ।”

“कर्पूरगौरवपुषं शरदिन्दुवक्त्रं-
पीताम्बरं सरसिजक्षमनन्तमादिम् । यश्चार्मिलाललित भूषणभावितांगं- रामानुजं भज मनोभयदं निजानाम् ।।

“श्रीरामचन्द्र की कीर्तिरूपी उज्ज्वल पताका को जिनका यश दण्ड-रूप है अर्थात् लक्ष्मणजी का सम्पूर्ण साहस केवल राम के प्रताप के उदय हेतु है, देखो यज्ञ-रक्षा और रंगभूमि और परशुराम-आगमन. ऐसे ही सब काण्डों में और चारों युगों में ऐसा ही है. देखो, सतयुग में अनन्तावतार होकर अपने सहस्रमुखों से केवल भगवद्‌गुणानुवाद ही गाया और द्वापर रामावतार में  दैत्यों का वध और जमुना और हस्तिनापुर का वर्णन इत्यादि केवल भगवद्त प्राप्ति के निमित्त है.  पद्मपुराणमें भविष्य लिखा है-

“पाखण्डे बहुले लोके कुदृष्टीजनसंकुले । कलौ वैष्णव सिद्धान्तं पुनरुद्धार्यते यती ।।

अर्थ- जब जैन, बौद्ध, चार्वाक,आदि का पाखण्ड कलियुग में फैल जाएगा और कुदृष्टि न करके संसार भर फैल जाएगा तब वैष्णव-सिद्धान्त का उद्धार करेंगे.

“अनन्तं प्रथमे युगे द्वितीये लक्ष्मणं तथा। तृतीये बलरामश्च कलौ रामानुजो यती।।”

“अर्थ जो सतयुग में अनन्त भक्त भये और त्रेता में लक्ष्मण और द्वापर में बलदेव सोई कलियुग में श्रीलक्ष्मणजी यती होईंगे।”

यति (मुनि या अवधूत)
हे स्वामी रामानुज के अनुयायियों ने कम-से-कम दक्षिण-देश में श्रीराम-जानकी की उपासना फैलायी और आज दिन भी भारतवर्ष में अनेक राम-जानकी के मन्दिर इसी सम्प्रदाय-वाले के अधिकार में हैं.

(3) स्वामी रामानन्द का सम्प्रदाय : – तीसरा मत स्वामी रामानन्द का है. स्वामी रामानन्द का जन्म प्रयागराज में संवत् 1400 विक्रमी में हुआ था. स्वामी रामानन्द ने सोचा कि बिना शूद्रों का उद्धार किये काम नहीं चलता, यही समय की मांग है. उन्होंने सभी शूद्र भाइयों से कहा “इस भारतवर्ष का मुख्य भोजन मांस नहीं है (जो की हमारे शूद्र भाई उस समय खाते थे), यहां  इतने प्रकार के अन्नों, स्वादिष्ट फलों का आविष्कार किया है कि मांस खाए बिना भी मनुष्य अच्छे-से-अच्छा भोजन करता और हृष्ट-पुष्ट रह सकता है.”

स्वामी रामानन्द जी आगे कहते है कि “तुम मांस खाना छोड़ दो और कण्ठी बांध लो तो हम तुम्हें अपनी पंगत में भोजन कराते हैं.” उनका एक प्रधान शिष्य रैदास शूद्र थे. इतना ही नहीं उन्होंने कबीर जुलाहे को भी अपना शिष्य बनाया. उन्होंने यह सिखाया कि राम-जानकी के चरणों में भक्ति होने पर आचार विचार का काम नहीं. इस भक्ति का सबको अधिकार है.

जिनके प्रिय न राम बैदेही। तजिये तिन्हें कोटि बैरी सम यद्यपि परमसनेही ।।

अर्थ:– जिन्हें राम प्रिय नहीं उन्हें करोड़ो शत्रु के रूप में देखकर उनका त्याग करना चाहिए.

मानस में स्वामी रामानन्द के स्थानापन्न भरत है. गोस्वामी जी रामानन्दी सम्प्रदाय के हैं और वे अयोध्या-काण्ड के अन्त में स्पष्ट रूप से कहते हैं कि-

कलिकाल तुलसी से सठान हठि राम सन्मुख करत को। 
जिसका अर्थ यह है कि स्वामी रामानन्द की शिक्षा ने मुझे रघुनाथ जी का भक्त बना दिया. इससे स्पष्ट होता है कि तुलसीदास जी रामानन्द संप्रदाय से थे.

रामानन्द संप्रदाय ने रामचरितमानस का सबसे अधिक प्रचार किया, उसके पश्चात सभी संप्रदाय मानस को दिव्य ग्रंथ मानने लगें. कलपत्री जी ने भी रामचरितमानस को मुख्य बताया है. इसके साथ ही एक प्रतिष्ठित प्रकाशन का भी बहुत बड़ा योगदान है, उन्होंने रामचरितमानस का देशभर में प्रचार किया और यह सबसे ज्यादा बिकने वाली ग्रंथ बन गई. मानस में तुलसीदास जी केवल वाल्मिकी रामायण को आधार नहीं बनाया बल्कि अन्य रामायण और पुराणों की भी सहायता ली है, लगभग सभी ग्रंथों का निचोड़ है.

रामानन्द संप्रदाय के स्वामी अंजनी नंदन दास अनुसार “अगर आपने पूर्ण रामचरितमानस पढ़ लिया इसका अर्थ यह है की आपने संपूर्ण वेदांत पढ़ लिया.”

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[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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